विराम

POEMSHINDIDR. NIKITA MUNDHARA

Dr. Nikita Mundhara

12/9/20231 min read

जिंदगी की दौड़ को,

आराम जरूरी है |

मानसपटल के संग्राम को,

ठहराव जरूरी है |

प्रश्नों से घिरे विवेक को,

विश्राम जरूरी है |

वेग से बहते मन को,

एक विराम जरूरी है |

विराम का अर्थ टालना नहीं,

स्थगित करना, या टरकाना नहीं |

ह्रदय को अनसुना कर, पीछा छुड़ाना नहीं |

विवेक से लड़, बैठ जाना नहीं |

विराम की नियति की नई शुरुआत है |

इसका अभिप्राय केवल मंथन है |

मंथन मन-मस्तिष्क का,

द्वार है यह, पुनः प्रारंभ का |

विराम की शक्ति की आलोचना है |

इसका अभिप्राय केवल विश्लेषण है |

विश्लेषण अपनी शून्यता का,

द्वार है यह पुनः अवसरों का |

बाहरी विकास के लिए,

अंतर वृद्धि जरूरी है |

और इस वृद्धि के लिए,

विराम जरूरी है |

कुंदन बनने के लिए,

तपना जरूरी है |

और तपन के अनुभव के लिए ,

विराम जरूरी है |

विराम एक संयोग है,

इससे भागो मत पार्थ,

अपनी उर्जा एकत्रित कर,

विराम के मूल्य को करो चरितार्थ |

- निकिता मुँधड़ा