बीता कल और आज-एक नारी का मानसिक संघर्ष

HINDIDR. NIKITA MUNDHARA

11/6/20231 min read

यह बात कुछ उन दिनों की है, जब भारत पर अंग्रेजों का राज था। राजस्थान के छोटे से कस्बे, बीकानेर में राजा गंगा सिंह जी राज करते थे। साल 1930 चल रहा था और कार्तिक का महीना था, दिवाली बस निकली ही थी और उसके 2 दिन बाद भाई दूज के शुभ अवसर पर बीकानेर के एक परिवार में सुंदर कन्या-रत्न का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया श्यामा देवी। श्यामा के परिवार में लोग भी थे और धन भी था। उसके पांच भाई और तीन बहन थे। सब कुछ खुशहाल ही था, परंतु जैसे ही श्यामा 9 वर्ष की हुई, उसके पिता जी का अकस्मात निधन हो गया और पैसों की अधिकता ने भाइयों को जुए की ओर अग्रेषित कर दिया। फिर क्या था, भाई सारे पैसे जुए में हार गए। श्यामा तब 10 वर्ष की थी, पैसे की जरूरत ने इतनी छोटी उम्र में उसका स्कूल छुड़वा दिया| श्यामा तब चौथी कक्षा में पढ़ रही थी, परन्तु फिर घर में माँ के साथ पापड़, बड़ी, अचार, नमकीन बनाने का काम करने लागी। भाई, पैसा कमाने के लिए दूर देश निकल गए और श्यामा की माँ अकेले अपने चार बेटियों के साथ जीवन बसर कर रही थी। श्यामा पढ़ना चाहती थी, पर ना पैसे थे, ना प्रोत्साहन| माँ के लिए बेटियों को पालना मुश्किल हो रहा था, तो माँ ने सभी बेटियों को एक के बाद एक शादिया तय कर दी| श्यामा की भी शादी हो गई। उसे एक अच्छा जीवन साथी मिला था| वह राजस्थान छोड़ कोलकाता आ बसी थी।

श्यामा की जिंदगी शादी के बाद काफी बेहतर हो गई, पर यह जिंदगी है खुशी के बाद गम के काले बादल तो फिर छा ही जाते हैं! जब श्यामा की पहली संतान जन्म लेते ही मर गई, उसके जीवन में जैसा अँधेरा सा छा गया| जीवन बसर हो रहा था परंतु धन की कमी शुरू होने लगी थी। इन सालों में श्यामा के भाईयो ने जूआ छोडकर, राजस्थान में ही अपना भोजनालय का काम शुरू कर दिया था। काम अच्छा चलने लगा और समय के साथ सभी धनवान हो गए, उनकी शादी-परिवार सब बसने लगा था। कोलकाता में श्यामा के पति का कपड़ो का करोबार था, परन्तु काम ना चल पाने के कारण, श्यामा भी अपने पति के साथ कोटा आकर बस गई। कोटा में चीजें बेहतर हुई, भाइयों का प्यार और साथ ही पैसों की भी कमी पूरी हो गई। इस बीच श्यामा ने तीन कन्या रत्न और एक सुकुमार को जन्म दिया। इक बार की बात है, कहते हैं ना किस्मत अपनी और आपको खींच लाती है श्यामा अपने पति के साथ कोलकाता अपने सास-ससुर को मिलने आई थी| केवल चार के दिन का भ्रमण होना था, परन्तु जिस दिन वह वापस कोटा लौटने वाले थे, उसी दिन उसके पति की सड़क दुर्घटना में तत्काल ही मृत्यु हो गई। श्यामा के लिए यह इतना बड़ा झटका था कि वह संभल ही नहीं पाई और गहरे शोक में डूब गई। उसके सभी बच्चे तो जैसे एक पल में ही अनाथ हो गए। उनकी सबसे बड़ी बेटी का नाम शारदा था। छोटी बहनों की जिम्मेदारी और बड़े भाई की नासमझी, माँ का यह हाल कि वह खड़े-खड़े बेहोश हो जाती। अभी शारदा 10 वर्षों की थी, ऐसा लगने लगा था मानो श्यामा की किस्मत ने शारदा की किस्मत के साथ हाथ मिला लिया हो। श्यामा के भाई उसका यह हाल देख कर, उसे कोटा ले आए वह 5 वर्षों तक वही रही और यहाँ सारे बच्चे, श्यामा के सास-ससुर, सब की जिम्मेदारी शारदा पर अटकी थी। वह 10 साल की लड़की, सब कुछ संभालती। मन में डॉक्टर बनने के सपने थे| उसे जीव विज्ञान बहुत पसंद था। वह लड़की जैसे-तैसे अपना स्कूल का काम करती, पढ़ाई लिखाई करती, घर भी संभालती, थोड़े बहुत पैसे भी कमाती, छोटे भाई-बहन के साथ अच्छे से रहती थी। उनकी जिंदगी पटरी पर आई थी, पैसे कम थे पर खुशहाली थी। 5 वर्ष पश्चात, जब श्यामा वापस आई, शारदा को बड़ी होते देख उसने सोचा कि वह उसकी शादी करवा दे। इसके चलते शारदा की पढ़ाई छूट गई थी, जब उसने पढने का आग्रह किया, तो उस की कॉपी-किताबें जला दी। जैसे-तैसे श्यामा ने दसवीं कक्षा पूरी की और तत्काल ही श्यामा ने शारदा की शादी करवा दी। शादी के पश्चात पता चला की शारदा के ससुराल वाले धोकेबाज थे। जिस इंसान से शारदा की शादी हुई वह इंसान एक हिंजड़ा था| शारदा के ससुराल वाले उसे बहुत मारते, कमरे में बंद कर देते, खाना नहीं देते थे। वह लड़की जिसे डॉक्टर बनना था क्या हुआ उसके सपनों का?

परन्तु शारदा ने हिम्मत नहीं हारी| किसी शादी में जब वह अपने ससुराल से बाहर निकल पाई, तो उसने अपने पीहर जाकर अपने मां, दादा-दादी, परिवार के सभी सदस्यों को अपनी कहानी बताई। परिवार ने बड़ी लड़की की यह दशा सुनकर उसका साथ दिया और लड़के के सारे टेस्ट करवाएँ और चुकी शारदा की बात सच निकली उनका तलाक हो गया| अब शारदा अपने पीहर रहने लगी थी। कहने को वह आजाद हुई, पर पीहर की जिंदगी ससुराल से बुरी निकली| श्यामा भी अपनी सारी तकलीफ सारा गुस्सा शारदा पर ही निकालने लगी। अच्छा खाना ना देती, बाहर ना जाने देती, दिन भर यही सुनाती, “तेरी वजह से अब बाकी बेटियो की भी शादी नहीं होगी!” फिर भी शारदा पढ़ना चाहती थी, लेकिन श्यामा ने साथ नहीं दिया और पिता की कमी के कारण उसका यह सपना कभी पूरा ही ना हो सका। बहुत कोशिश करके, उसे एक घरेलू उद्योग में काम मिला, उसने यह काम इसलिए पकड़ा था कि उसे घर में ताने ना सुनने पड़े, लेकिन उसके सारे कामये पैसे घर के खार्चो में लग जाते थे। अपने पैसों से अपने लिए एक नई साड़ी भी नहीं खरीद पाती थी। इतने तानो के बाद भी शारदा नहीं टूटी, उसने पैसे कमा कर अपने भाई-बहनों की शादी करवाई। सब अपने घर में खुशी से जिंदगी बिताने लगे थे, परंतु शारदा की जिंदगी नहीं बदली। उसकी पहली शादी तब टूटी थी जब वह 15 साल की थी और अब वह 30 साल की हो गई थी। जिंदगी में मानो काम करने के अलावा और कोई मंजिल ही नहीं रह गई थी।

जिंदगी ने करवट बदली, शारदा के लिए एक 15 साल बड़े विदुर का रिश्ता आया| इस पर उसने सोचा, चलो कुछ तो नया है, शायद कुछ बदलेगा| वह श्यामा के तानो से परेशान थी| इसलिए उसने भी हाँ कह दी। शारदा की जिससे शादी हुई, उसके पहले से ही एक 10 साल की बेटी थी| तो शादी कर शारदा बनी उस लड़की की “सौतेली मां” | शारदा ने उस लड़की को दिल से अपनाया, परंतु वह लड़की – जिसका नाम पाखी था – उसने एक ही वर्ष पूर्व, अपनी माँ को खोया था| क्या उसके लिए शारदा को अपनाना सरल था? हर त्यौहार पर बार-बार जब पाखी अपनी माँ को याद करती, रोती, नए कपड़े नहीं पहनती, तो शारदा समझती कि वह एक छोटी बच्ची ही तो है, पर ये समाज शारदा को सौतेली माँ कह कर ताने देता था। शारदा के पति का बस एक ही मकसद था, उन्होंने शादी भी पाखी की परवरिश के लिए ही की थी। उन्हें शारदा से विशेष कोई लगाव नहीं था। पाखी को रोते देख, शारदा के पति भी उसके शिकायत करते, डांटते, फटकारते थे। शारदा ने सब कुछ सहन किया। इस बार वह अपनी शादी नहीं तोड़ना चाहती थी। समाज का डर, पहली शादी नहीं चली, अगर वह अपनी दूसरी शादी भी छोड़ देती है, तो समाज उसे ही गलत समझेगा। शादी के एक साल बाद शारदा ने एक प्यारी-सी बेटी को जन्म दिया जिसका नाम अंजलि था। समय के साथ, पाखी को अंजलि में एक छोटी बहन मिल गई, उसका मन लगने लगा और उसने शारदा को अपनी माँ स्वीकार लिया। शारदा के पति की कमाई से घर अच्छे से नहीं चल रहा था, इसलिये शादी के तुरंत बाद ही शारदा ने अपना पुराना काम शुरू कर लिया। अंजलि के जन्म के बाद, शारदा ने अपने काम द्वारा बहुत सारा धन एकत्रित किया| उसका एक ही सपना था – कि उसे अंजलि को डॉक्टर बनाना है। बढ़ती उम्र के साथ उसे अंजलि और पाखी में अपनी छवि, अपने अरमान, दिखते थे। अंजलि और पाखी, दोनों ही समय के साथ बढ़ने लगी| दोनों स्कूल जाकर पढाई करते थे। भूतकाल की तुलना में, वर्तमान काफी अच्छा चलने लगा था। शारदा अपने पैसों से अपनी माँ श्यामा का भी अच्छा ख्याल रखती थी। इस बीच श्यामा के सास-ससुर टीबी की बीमारी के कारण स्वर्ग सिधार गए। सास-ससुर के चल बसने के बाद श्यामा बिल्कुल अकेली हो गई थी। शारदा ने श्यामा को अपने पास ही अलग एक कमरे का घर किराये पर लेकर रख लिया था| शारदा का अपनी माँ के प्रति इतना प्रेम देख, उसकी सास को ईर्ष्या होने लगी थी और उसने परिजनों के जाकर शारदा की बहुत बुराई की। पाखी की इस समय तक 12वीं पूरी हो चुकी थी, वैसे उसे आगे पढ़ने में कोई खास रुचि नहीं थी। पाखी को हाथ के काम, कढ़ाई, बुनाई का शौक था। शारदा ने पाखी का कॉलेज में दाखिला भी करवाया, परंतु पाखी का पढाई की ओर रुझान नहीं था। इस बीच पाखी के लिए एक बीकानेर से रिश्ता आया, पाखी 19 साल की हो चुकी थी, अपनी मर्जी से पाखी शादी करके ससुराल बीकानेर चली गई।

पाखी की शादी होते ही शारदा के पति ने कहा–"मेरी जिम्मेदारी अब पूरी हो गई, अब मैं काम नहीं करूंगा।" शारदा अचंभीत रह गई की अब उसका और अंजलि का क्या होगा? शारदा के पति तो काम छोड़ कर घर में बैठ गए, काम में अभाव था, तो वह डिप्रेशन में चले गए। काम पर जाने को कहती तो रोज घर में झगड़े होते। पर इन सबके बीच शारदा ने अंजलि को स्कूल से नहीं निकाला, अपनी मेहनत की कमाई से उसे पढ़ाया। शारदा के पति ने इसके बाद 6 साल तक कोई काम नहीं किया, घर में रहते, शारदा के पैसों पर ही रोजी रोटी चल रही थी। कई बार वह चाहती थी कि इस रिश्ते से आजाद होकर अपनी बेटी को लेकर चली जाए। खुद पर उठाए कीचड़ से जैसे फर्क पड़ना बंद हो चुका था, पर अंजलि... उसके लिए वह सब कुछ चुपचाप सहती गई। अंजलि पढ़ाई में अव्वल आने लगी थी। 12वीं के बाद दिल पर पत्थर रखे उसने अंजलि को राजस्थान में वनस्थली विद्यापीठ पढ़ने भेज दिया। उसे डर था कि कहीं अपनी माँ और नानी की तरह आवेश में आकर वह अंजलि की पढ़ाई ना छुडवा दे। शारदा अपना वही पुराना काम करती, अपने पति को संभालती, सास और माँ को संभालती थी। उसका केवल यही सपना था कि अंजलि को डॉक्टर बनते देखना है। इस बीच शारदा की सास का निधन हो गया था। अंजलि स्नातक और स्नातकोत्तर में पूरे कॉलेज में प्रथम आई| उसे अपने कॉलेज में स्वर्ण पदक मिला। शारदा की मेहनत रंग लाने लगी थी। इसके बाद अंजलि को भारत के सबसे बड़े विश्वविद्यालय आईआईटी बॉम्बे से डॉक्टरी की पढाई का प्रस्ताव मिला। उसे डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए भारत सरकार से पैसे भी मिलने वाले थे। शारदा के पति, परिवार जनों ने बहुत आपत्ति जताई, सब ने कहा अब शादी करवा दो पर शारदा के पैर कहाँ थमने वाले थे। उसके लिए तो जैसे उसका सपना ही पूरा हो रहा था क्योकि अंजलि में भी वह खुद ही को देखती थी। अंजलि के साथ शारदा भी मुंबई आई उसका दाखिला करवाने। अंजलि की डॉक्टरी की पढाई आईआईटी बॉम्बे में अच्छे से चलने लगी थी। साथ ही, छोटे बच्चों को पढ़ाकर, पीएचडी के साथ-साथ अंजलि काम भी करने लगी और उसने अपनी माँ को काम से रिटायर होने के लिए माना लिया। अंजलि ने अपनी माँ और नानी श्यामा को कोलकाता के अकेलेपन की जिंदगी से दूर, परिवार के बीच कोटा में लाकर एक अच्छे घर में बसा दिया था।

आज, समय के साथ अंजलि की डॉक्टरी की पढ़ाई भी पूरी हो गई है और शारदा का सपना उसकी बेटी अंजलि ने पूरा कर दिया है। शारदा और श्यामा दोनों साथ हंसी-खुशी कोटा में रहने लगे है। पाखी भी अपने ससुराल में खुश है, वह शारदा को अपनी माँ मानती है, हर कुछ दिनों में बीकानेर से कोटा मिलने आती है। शारदा की जरूरतों का अंजलि और पाखी दोनों मिलकर ख्याल रखने लगे है।

जरा सोचो...

अगर शारदा ने भी बीते कल की तरह अंजलि की पढ़ाई छुड़वा दी होती, तो क्या आज जिंदगी इतनी खुशहाल होती?


- निकिता मुँधड़ा